Nishabd

Entries from March 2007

Sahara

March 6, 2007 · 2 Comments

Lamho ka Hath thaamein Dekhoo Dariche1 ke Us paar, 1.Khidki (window)

Aate hai nazar falak2 ke taarein karte tabassum3 ka intezaar, 2.Aasman (sky) 3.hassi (smile)

Yah intezaar jo hai bezubaan,

Khala4 ki khamoshiyon se hoti hai bayaan, 4. antariksha(space)

Jaise Madham hoti Sham Ki sarhado se,

Poochti ho roshni nisha ke nishaan

Aadatan5 shafak6 par hoti hai khayanat7 5.habit 6.lal kshitij(red horizon)7.beimaani(cheating)

Sare-e-shaam8 taarik9 parwaaz10 liye kare ek shararat 8.shaam hote hi (as the dawn breaks)

9.andhera(dark) 10. udaan(flight)


Barf se pighalte baadlo ka hota hai shor,

Is shor Ki khwahishein hai kuch aur,

In khwahishon ka maahru11 hai adhura 11.Chand(moon)

Falak par kaamil12 ka nasha hai kuch aur, 12. poora chand(full moon)

Kahi ku-ba-ku13 kisi gosho14 mein ru-ba-ru honge 13 gali-gali (street) 14.kono(corner)

Yah hotho ke kinaare,

Intezaar ke anjaam par tab so jaayenge yah taare,

Ab fir kabhi aaftaab15 ke lamas16 mein jagenge yah saare, 15.suraj(sun) 16. sparsh(touch)

Meri khwabo ke taabir17 dariche ke is paar 17. matlab (meaning)

Karte hai yah isharein,

Dil mantazir18 thoda rukta hai fir chal padta hai, 18. jo intezzar kare(the one who waits)

Dhunde sehra19 mein,kahi yahi kahi naye sahare….. 19.registaan,viraana (desert,empty place)

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इंतज़ार…

March 6, 2007 · Leave a Comment

पल-पल हर पल की आहट मे खामोश सा है
हम से है अलग पर इन साँसो से कुछ जुड़ा सा है
धीमे-धीमे गिरते वक्तपर रफ्तार का अहसास सा है
हर थमी बातो मे साथ छोड़ते अल्फाज़ का अह्सास सा है…

चाँद तो आता है नज़र पर इसमे यह सूरज खो गया क्यो है
आँखो मे बसे है चेहरे पर अपना ही अक्स छुपा क्यो है??

कही भूला,कही छुट सा गया है मुझसे
थोड़ा ठहरा, थोड़ा सहमा हूँ इससे
हर रात के लिए रोशन है कुछ दिये
बुझे चिरागो से ढूढूगा किसे
पर यह रोशनी ही तो अंधेरे का सबब है
इन्ही परछाइयो का तो रूह को समझ है

नज़रो को ढूढती पैरो के निशान
जब सेह्रा मे साहील का हुआ था गुमान
कही तो साहील होगा इस सागर के पार
शायद इसलिए है इन यादो को…
और थोड़ा…थोड़ा और इंतज़ार…

Categories: wait

आहिस्ता-आहिस्ता….

March 6, 2007 · 2 Comments

यह सिलसिले ये रासते
यह बारीश मे भीगती चाहते
वह खामोशी वह बाते
वह पलको पर लिखी आयते

कैद तस्वीर-ए-आइने मे गुम से होते अक्स
अधखुली आँखे नींद को समेटकर याद करते वो शख्स
ठहरे झील मे बढ़ते दायरो मे बूंदे
उन बूंदो की लकीरो मे दम तोड़ते मेरी रूह की आहे
कुछ मिट्टी मे तो कुछ खुशबू मे
तो कुछ हवाओ मे तंज करती राहे
तो कही फिकरे कसते तन्हा आकाश की निगाहे

मेहताब की ख्वाहिश मे निशा का सबब ढूढते हम कही
बस एक सन्नाटे की खोज मे है इस शोर मे हम यही
गुमनाम आरज़ू का सदमा अंजाम पर चल पढता है फिर वही
पर हर अल्फाज़ रूख पे नकाब लिए समझाते है
अब वह कुछ नही…

मेरी आवारगी के नशे मे ज़खम बनते नासूर
शायद कसूर नही है मेरा किस्मत का
यह तो बस दिल के है बदलते तासूर

शमा कि साँसो मे सूखते होठ अहिस्ता-अहिस्ता
बिखरे रेत पैरो से जूड़ते अहिस्ता-अहिस्ता
सेहरा मे गुम होते आशियाँन आहिस्ता-आहिस्ता
देर से सही हमे अश्को से इश्क होता आहिस्ता-आहिस्ता….

Categories: search

साहील…

March 6, 2007 · Leave a Comment

वास्तवीकता के हदो से दूर
कल्पना के पास
हवा मे घुलते कोशिशो के अहसास
छलकते रंगो मे ढलता दीन
नीशा के आहटो पर सीसकती शाम

लम्हो के सागर मे उभरती डूब्ती परछाई
अचल संवेदनओ पर लकीरे गहराई
कीसी अजनबी, अदर्श्य स्पर्श पर मुस्कुराते अधर
थमने सा लगता है शबदो का असर
आँखो मे भी क्षितीज(kshitij) दूर कही
तभी प्यासा हर्दय मर्गतर्षणा मे कह उठथा है
कही यह साहील तो नही ॥

Categories: coast

Kshitij ke us paar

March 6, 2007 · 2 Comments

वह आँखे जीनमे दर्द बसा है कही
गीरकर फ़ीर से उठने का सपना दबा है वही
वह काले बीज सपने अंकुरीत होते है जहा
त्न्हाई की जहराई मे प्यार का नीर छलकता है जहा
एक पर्षन के जवाब की तलाश मे नज़र आते है…

अक्सर आशा से बाते करता है वह
अगर वह चल सकता तो क्या यह होता
अगर वह दौड़ सकता तो कोई कुछ कहता
उम्मीद् के मील पथर पर मौत् के फ़ास्ले
क्या कुछ नही बताते है मुझे
पल-पल स्वपन-क्स्तूरी के पीछे उड़ना
बहुत कुछ का अहसास कराते है मुझे….

डुब्ती लफ़्ज़ो मे जब ध्ड़कन साथ छोड़ने लगे
और वीलुपत की प्यास बढ़ने लगे
तब इन आखो को बंद कर देखना
शायद नज़र आ जाए शीतीज के उस पार….

Categories: horizon

मै..

March 6, 2007 · 3 Comments

मै…, एक शब्द नही…, एक आवाज़ नही…, मै कोई रूह नही.., कोई कायनात नही.., सागर मे बेहता बूंद हू जो, साहील के रेत मे घुल जाता हू, फीर से बेहने के लीये…..॥

Categories: me